30.5.09

भरी जवानी में ऐसा आराम!

मई की धड़कन बन्द होने वाली है। सूरज बेहद गुस्से में है। लेकिन मुझ पर कोई असर नहीं है। मेरा एसी चिन्तन चालू है। तमाम दुखों के साथ कुछ सुख भी मिल ही जाता है। मेरी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि मैं एसी चिन्तन कर सकूं। लेकिन इस कमजोरी के बावजूद एसी चिन्तन कर पा रहा हूं। कार्यस्थल पर मुझे बेहद आराम की स्थिति में रखा गया है। कहते हैं कि भरी जवानी में ऐसा आराम उचित नहीं है। लेकिन मुझे नहीं लगता कि इस करियर को मैं चालू रख पाऊंगा। इसलिए सोचता हूं कि ज्यादा चिन्ता की बात नहीं है। अर्थशास्त्र के ‘आकुपेशनल मोबिलिटी’ की ज्यादा सम्भावना नजर आती है।

सबकुछ जानते हुए भी न जाने क्यों टाइम ‘पास’ कर रहा हूं। शायद सामाजिक दबाव के चलते। बाबू दिल्ली में नौकरी करते हैं, इसका बड़ा महत्व है। माताजी भी सुख महसूस करती हैं। वियोग से दुख तो अवश्य उपजता है लेकिन बाबू ठीक-ठाक नौकरी करते हैं, आवारागर्दी नहीं करते (उनकी नजर में) इस वजह से प्रसन्न भी होती हैं। इस वजह से मैंने भी कहा कि “जौ तुम सुख मानहु मन माहीं।”

पढ़ाई-लिखाई और आवारागर्दी के दौरान नौकरी के बारे में मैंने कभी सोचा भी न था। दिल्ली-पंजाब जाकर नौकरी तो सपने में भी नहीं लेकिन दोनों जगहों पर रहना पड़ा और नौकरी करनी पड़ी। शायद प्रारब्ध के चलते। इससे एक फायदा अवश्य हुआ कि कई चीजों की जानकारी हुई, उन्हें करीब से देखने-समझने का अवसर मिला। एक अच्छी बात और हुई मीडिया व अन्य बौद्धिक हलकों में वामपन्थियों या मिलती-जुलती विचारधारा वाले लोगों के षड्यन्त्रों और दुराग्रहों को जानने-समझने का अवसर मिला। इससे मेरी अपनी निष्ठा और प्रबल हुई। पहले छोटी-छोटी बातों मसलन तथाकथित आत्मसम्मान, जातीय आग्रह हेन-तेन को लेकर विचारधारा से भटकाव हो जाया करता था। यह भटकाव विद्रोह के स्तर तक भी पहुंच जाता था। लेकिन इस खित्ते में आकर ज्ञान हुआ कि बड़े प्रयोजन के लिए छोटी-छोटी बातों को दरकिनार कर देना ही श्रेयष्कर होता है।

नौकरीपेशा प्रवृत्ति का मुझमें अभाव है। वैसे अभाव तो मुझमें कई सद्गुणों का है। आखर मन में आकार लेते हैं और वहीं खो भी जाते हैं। उन्हें कागज पर उतारने की जहमत नहीं उठाता। एक अवगुण तो जीवन पर ही भारी पड़ रहा है लेकिन उसमें डूबना-उतराना जारी है। उम्मीद है कि जल्द निजात मिल जायेगी।

बहरहाल, एसी चिन्तन के बारे में सुनते जाइए। सर्वहारा, बुर्जुआ, क्रान्ति, चिनगारी जैसे शब्द लगातार दिमाग में कौंधते रहते हैं। हालांकि मैं वामपन्थी नहीं हूं। अन्तिम व्यक्ति और एकात्म मानववाद, ट्रस्टीशिप आदि पर भी मन्थन चलता रहता है। हालांकि, इस मन्थन से कोई अमृत निकलने वाला नहीं है। मन्थन और चिन्तन की इसी प्रक्रिया में आज फिर ‘वो’ मिल गए। उसी राह पर - उसी मोड़ पर। मैंने फिर कहा ‘तूने शर्त-ए-वफा भुलाई है।’ वो फिर कुछ नहीं बोले चुपचाप चल दिए। उनके दीदार क्या हुए एकबारगी मन फिर सरसराने लगा है। लेकिन अब तो सावन-भादों तक इन्तजार करना पड़ेगा। जब झूम के बरसेगा सावन तभी कुछ हो पायेगा, ऐसा ज्योतिषियों ने बताया है। बहरहाल उनकी राय है कि तब तक सरसराते रहिए। चुप मत बैठिए। सिर्फ टिप्प-टिप्प मत करिए, कुछ करिए-करिए।

7.3.09

सररर...र...र...र…

अभी होली आने में करीब-करीब एक सप्ताह बाकी है लेकिन मन है कि सररर...र...र...र......र कर रहा है। देखिए न! मानता ही नहीं है, कह रहा है जोगीरा सररर...र...र...र......र…। कमबख्त रुकने को कतई तैयार नहीं, पेले हुए है सररर...र...र...र…। सरसों के फूल, फल में बदल गए हैं। अभी कल ही घर बात हुई थी तो पता चला कि कट गई सरसों। मैं वसंत का इंतजार करता रह गया और न जाने कब सरसों कट गई। ठीक से फूल भी नहीं देख पाया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी भी (‘भी’ के लिए आचार्य प्रवर माफ करियेगा) ऐसे ही इंतजार करते रहे। अपने साहित्याश्रम के तमाम पेड़ों में अगोरते रहे वसंत। आखिर एक पुष्प-बेल फूल कर कुप्पा हो गई और खड़-खड़ाकर आ गया वसंत। खैर, ऐन मौके पर मेरे पास भी आ गया है वसंत। आ ही नहीं गया है, धनुही से तीर भी चला रहा है। सदियों से उसकी आदत जो रही है। खेतों में हरियाली अपने चरम पर है। गेहूं जवान होकर अब अंगड़ाई ले रहा है। रोज धूप ज्यों-ज्यों जवान होती है त्यों-त्यों उसकी जवानी की गंध दिशाओं में फैल जाती है। यह सब कुछ अनुभव आधृत ही है, लेकिन है सौ फीसद सही। मैं तो यहां हूं भारत के दिल दिल्ली में। यहां वसंत का मतलब सड़क पर चमचमाती, शोर मचाती गाड़ियों से है। निवासस्थान पर भी सब कुछ अतिसामान्य है। कार्यस्थल पर भी कोई वसंत नहीं आया, सबकुछ यथावत है। इसी बीच आज ‘वो’ मिल गए। मैंने कहा तूने शर्ते-ए-वफा भुलाई है। वो कुछ बोले नहीं चुपचाप चल दिये। शोर-गुल के इस माहौल में ये पंक्तियां ऊपर वाले तीर-धनुष की वजह से उपजीं। अब तो होली तक मन सरसराता रहेगा। होली के दिन एकदम से
ठेठ हो जायेगा। होली है ही इसीलिए की मन ठेठ हो जाए, तन ठेठ हो जाए, सब कुछ ओरिजिनल अवस्था में पहुंच जाए। लेकिन रह-रहकर दिक्कत हो रही है कि ‘‘अबकी फिर नाहीं जा पाइब होली में घरे।’’


Mitron pichhle varsh kisi anya blog par meri yeh rachna prakashit hui thi. Ise is varsh bhi daal raha hoon. waise is baar to main apne ghar par hoon.

25.12.08

भयंकर टारगेट के बाद हत्या और हल्ला


ध्यान योग्य तथ्य--- यह सब बातें बिल्कुल नयी नहीं हैं। सब लोग इन्हें जानते हैं।


टारगेट भयंकर होने पर कारिन्दा या तो हत्या कर देगा या आत्महत्या कर लेगा। मायावती की दुकान के कारिन्दे ने कुछ ऐसा ही किया। चूंकि कारिन्दा बाहुबली था इसलिए आत्महत्या की बजाय हत्या कर दिया। दूसरी बात एक गम्भीर सवाल बन जाती है। क्या यूपी में अधिकारी इतनी रिश्वत लेते हैं कि उनसे 50 लाख रुपये चन्दा मांगा जा सके? इसका उत्तर है... हाँ...। बड़े अधिकारी के लिए यह रकम कोई बहुत नहीं। जनता के धन में से वह 10-20 करोड़ इधर-उधर तो कर ही देता है। एक और बात यूपी में टिकट की दुकान सजती है जहां से लुटेरे इसकी खरीद-फरोख्त कर लेते हैं। जिसके बाद वह माननीय बन जाते हैं। एक प्रश्नोत्तर पर और नजर डाल लीजिए- क्या यूपी में गुण्डे लोगों को मारते-पीटते और सड़क पर घसीटते हैं। जी हां! मैंने ऐसा अपनी आँखों से देखा है। यह भी देखा है कि उसे मारने के बाद थाने ले जाया जाता है जहां जिन्दा बच जाने पर उसे जख्मी हालत में जेल भेज दिया गया। यहां तो इन्जीनियर साहब मरकर मुक्ति पा गए नहीं तो उन्हें भी जेल जाना पड़ता। ऐसी घटनाओं के बाद यूपी में आमतौर पर वही लोग हल्ला मचाते हैं जो ऐसे खेल में आकण्ठ डूबे हुए हैं। लेकिन वे करें भी तो क्या गर हल्ला न मचाएं। वे हल्ला शायद इसलिए मचाते हैं कि आगे उन्हें यह सब करने का अधिकार हासिल हो सके। दुख यह कि जनता कभी हल्ला नहीं मचाती है वह आमतौर पर चुप रहती है। उसे हल्ला देखने में मजा आता है मचाने में नहीं।

अबकी बार बहनजी के शासन की शुरुआत में आस तो बंधी थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब उनके गुण्डे मुलायम के गुण्डों की तरह बेलगाम हो गए हैं। ऐसे ही दो प्रकरणों पर मैंने एक अप्रकाशित (किसी कारण से) खबर लिखी थी। कृपया इस पर भी गौर फरमाएं---
अपने यहां रसूख वाले लोग अपराध करने के बाद जेल की जगह अस्पताल जाया करते हैं। अपराध की तैयारी या उसे कारित करने के वक्त ये असाधारण और अदम्य साहस का परिचय देते हैं। लेकिन अपराध हो जाने के बाद न जाने कैसे वह डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं। अक्सर इनको सीने में ही तकलीफ हो जाती है और रक्तचाप हिमालय यात्रा पर निकल पकड़ता है। इस स्थिति में मानवाधिकार और कानून का तकाजा इन्हें जेल के बजाय अस्पताल पहुंचा देता है। माननीय लोग आमतौर पर सुविधा में खलल बर्दाश्त नहीं करते।
आज और कल, कल और आज अपने गोरखपुर की भी तस्वीर ऐसी ही है। अपने और सूबे के पूर्व मंत्री जमुना निषाद महाराजगंज कोतवाली गोलीकांड याकि हत्याकांड में अभियुक्त बन गए तो हंगामा बरपा। बहन जी की दृष्टि थोड़ी तिरछी हुई तो बेचारे जेल चले गए और मंत्री पद भी गंवा बैठे। खैर माननीय थे इसलिए जेल में तो रह नहीं सकते थे। तब से अब तक लगातार अस्पताल में आराम या कहें कि स्वास्थ्यलाभ ले रहे हैं। मेरे विचार से स्वास्थ्यलाभ लेने के लिए न्यायिक अभिरक्षा से अच्छा और कोई समय नहीं सकता। मुफ्त का इलाज और भोजन तथा खाली समय और खैरख्वाहों की भीड़, आदि...आदि। बात जमुनाजी की हो रही है तो थोड़ा तफ्सील से बता दें कि इनको हुआ क्या है। पहले तो इनको दिल की बीमारी ने आ घेरा और उसका इलाज-पानी हुआ। डॉक्टर कहते रहे कि सब ठीक है, दवा जेल में भी चलती रहेगी। लेकिन जमुनाजी संघर्षशील व्यक्तित्व के धनी हैं इसलिए संघर्ष कर-करके- कर-करके बता डाले कि नहीं मेरा इलाज मेडिकल कॉलेज जैसी ही किसी जगह पर हो सकता है। वह भी किसी अच्छे-भले झकास टाइप के रूम में। संघर्ष की जीत हुई और जमुना जी गोरखपुर-टू-गोरखपुर वाया देवरिया जेल की यात्रा बजरिए अस्पताल पूरी कर रहे हैं। पहले दिल ने दग-दग किया अब पेट से नीचे हलचल होने लगी। आमतौर पर यह हलचल पानी भरने से उत्तपन्न होती है। और इस हलचल का एक ही शर्तिया इलाज है ऑपरेशन। तो जमुनाजी के भी इस अंग विशेष की चीरफाड़ हो गई। वैसे यह अंग नितांत निजी होता है लेकिन चूंकि यहां मामला जनप्रतिनिधि का है इसलिए इसकी भी चर्चा करनी पड़ रही है। अंदर तक पैठ रखने वाले सूत्र बता रहे हैं कि पानी भरा ही नहीं था। पत्रकार हैरान और परेशान है कि इतने अहम अंग की अनायास चीड़फाड़ क्यों कराई गई। जवाब सीधा है कि माननीय लोग जेल में तो रह नहीं सकते और अस्पताल में रहने के लिए कोई तो बहाना चाहिए।
अब आइए ताजातरीन मामले पर नजर डालते हैं। विगत दिनों शहर में गैंगवार हुआ, जमकर गोलियां चलीं। महानगर थर्रा गया। यहां कि फिजा में अब जब-जब थरथराहट होती है तो विनोद उपाध्याय नाम के बसपा नेता का नाम सुर्खियों में होता है। गुजिश्ता कुछ सालों से तो बहरहाल यही हाल है। गोया कि अबकी भी विनोद उपाध्याय का नाम प्रकाश में आया और बसपा की पुलिस को उन्हें गिरफ्तार करना पड़ा। कहानी का विस्तार आगे कुछ इस तरह से होता है। वारदात के बाद सारे शहर का रक्तचाप उच्च हुआ तो स्वाभाविक रूप से इन नेता जी का भी हुआ। होता भी क्यों नहीं। इसी शहर की हिफाजत, विकास व अन्य तमाम मुद्दों को लेकर ये नेता बने हैं तो चिन्तित होना लाजिमी है। बहरहाल श्री उपाध्याय का भी रक्तचाप-वक्तचाप असामान्य हो गया और सीने में तकलीफ-वकलीफ पैदा हो गई। इस तरह श्री उपाध्याय अस्पताल में विश्राम करने लगे। इस हालत में बिगड़ी तबियत को कायदन ठीक नहीं होना चाहिए था लेकिन कमबख्त ठीक होने लगी। अब बसपा के प्रशासन को चिन्ता सताने लगी कि नेता जी को कहीं जेल न भेजना पड़े। इसलिए न्यायालय को बताया गया कि इस शेर दिल नेता को हरी-पीली टट्टियां-वट्टियां होने लगीं हैं और इसके लिए जेल से बाहर अस्पताल में रहना बहुत जरूरी है। न्यायालय माननीय होता है इसलिए बता दिए नहीं तो बताते भी नहीं। यू हीं अस्पताल में रखते, सेवा-सुश्रुषा करते। लेकिन माननीय न्यायालय ने फटकार लगाई है और पूछा है कि ऐसा कैसे?